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Christmasईसा मसीह का जन्म एक देवता से हुआ।प्रमाण : पवित्र बाईबल मती रचित सुसमाचार मती=1ः25 पृष्ठ नं. 1-2 पर।ईसा मसीह की ...
12/26/2022

Christmas
ईसा मसीह का जन्म एक देवता से हुआ।
प्रमाण : पवित्र बाईबल मती रचित सुसमाचार मती=1ः25 पृष्ठ नं. 1-2 पर।
ईसा मसीह की पूज्य माता जी का नाम मरियम तथा पूज्य पिताजी का नाम यूसुफ था। परन्तु मरियम को गर्भ एक देवता से रहा था। इस पर यूसुफ ने आपत्ति की तथा मरियम को त्यागना चाहा तो स्वपन में (फरिश्ते) देवदूत ने ऐसा न करने को कहा तथा यूसुफ ने डर के मारे मरियम का त्याग न करके उसके साथ पति-पत्नी रूप में रहे। देवता से गर्भवती हुई मरियम ने ईसा को जन्म दिया।

12/26/2022

#गरिमा_गीता_की_Part_82
गीता अध्याय 15 सारांश।।

‘‘गीता अध्याय 15 श्लोक 1-4 का सारांश’’

।। सृष्टि रूपी वृक्ष का वर्णन।।
अध्याय 15 के श्लोक 1 में कहा है कि ऊपर को पूर्ण परमात्मा रूपी जड़ वाला नीचे को तीनों गुण (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिवजी) रूपी शाखा वाला संसार रूपी एक अविनाशी विस्तृत वृक्ष है। जैसे पीपल का वृक्ष है। उसकी डार व साखाएँ होती हैं। जिसके छोटे-छोटे हिस्से (टहनियाँ) पते आदि हैं। जो संसार रूपी वृक्ष के सर्वांग जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला पूर्ण ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी संत है। कबीर परमेश्वर जी कहते हैं:--

कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, निरंजन (ब्रह्म) वाकि डार। तीनों देवा शाखा हैं, पात रूप संसार।।
कबीर, हम ही अलख अल्लाह हैं, मूल रूप करतार। अनन्त कोटि ब्रह्मण्ड का, मैं ही सिरजनहार।।

यह उल्टा लटका हुए संसार रूपी वृक्ष है। ऊपर को जड़ें (पूर्णब्रह्म परमात्मा-परम अक्षर पुरुष) सतपुरुष है, अक्षर पुरुष (परब्रह्म) जमीन से बाहर दिखाई देने वाला तना है तथा ज्योति निरंजन (ब्रह्म/क्षर) डार है और तीनों देवा (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) शाखा हैं। छोटी टहनियाँ और पत्ते देवी-देवता व आम जीव जानों।

 अध्याय 15 के श्लोक 2 में कहा है कि उस (अक्षर पुरुष रूपी) वृक्ष की नीचे और ऊपर गुणों (ब्रह्मा-रजगुण, विष्णु-सतगुण, शिव-तमगुण) रूपी फैली हुई विषय विकार (काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार) रूपी कोपलें व डाली (ब्रह्मा-विष्णु-शिव) रूपी। इस जीवात्मा को कर्मों के अनुसार बाँधने का मुख्य कारण है तथा नीचे पाताल लोक में, ऊपर स्वर्ग लोक में व्यवस्थित किए हुए हंै। (गीता जी के अध्याय 14 के श्लोक 5 में प्रमाण है कि - हे महाबाहो (अर्जुन)! सतगुण, रजगुण, तथा तमगुण जो प्रकृति (माया) से उत्पन्न हुए हैं। ये तीनों गुण जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं।)

 अध्याय 15 के श्लोक 3 में गीता बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि इस (रचना) का न तो शुरु का ज्ञान, न अंत का और न ही वैसा स्वरूप (जैसा दिखाई देता है) पाया जाता है तथा यहाँ विचार काल में अर्थात् तेरे मेरे इस गीता ज्ञान संवाद में मुझे भी इसकी अच्छी तरह स्थिति का ज्ञान नहीं है। इस स्थाई स्थिति वाले मजबूत संसार रूपी वृक्ष अर्थात् सृष्टि रचना को पूर्ण ज्ञान रूप (सूक्ष्म वेद के ज्ञान से) शस्त्रा से काट कर अर्थात् अच्छी तरह जान कर काल (ब्रह्म) व ब्रह्मा-विष्णु-शिव तीनों गुणों व पित्रों- भूतों- देवी- देवताओं, भैरांे, गूगा पीर आदि से मन हट जाता है। इसलिए इस संसार रूपी वृक्ष को काटना कहा है।

अध्याय 15 के श्लोक 4 में गीता ज्ञान दाता ने बताया है कि उपरोक्त तत्वदर्शी संत जिसका गीता अध्याय 15 श्लोक 1 व अध्याय 4 श्लोक 34 में भी वर्णन है मिलने के पश्चात उस स्थान (सतलोक-सच्चखण्ड) की खोज करनी चाहिए जिसमें गए हुए साधक फिर लौट कर (जन्म-मरण में) इस संसार में नहीं आते अर्थात् अनादि मोक्ष प्राप्त करते हैं और जिस परमात्मा से आदि समय से चली आ रही सृष्टि उत्पन्न हुई है। मैं काल ब्रह्म भी उसी अविगत पूर्ण परमात्मा की शरण में हूँ। उसी पूर्ण परमात्मा की ही भक्ति पूर्ण निश्चय के साथ करनी चाहिए, अन्य की नहीं।

इसी का प्रमाण पवित्र गीता अध्याय 18 मंत्र 46, 61, 62, 66 में भी है कि गीता ज्ञान दाता ने अपने से अन्य परमेश्वर बताया है। उसी की शरण में जाने को कहा है तथा अपना इष्ट देव यानि पूज्यदेव भी उसी को बताया है कि मैं उसी की शरण हूँ।

अन्य प्रमाण:- गीता अध्याय 18 श्लोक 64 में यह भी प्रमाण है कि गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि सब गोपनीय से भी अति गोपनीय वचन सुन जो तेरे हित में कहूँगा कि जिस परमेश्वर का मैंने इसी अध्याय 18 श्लोक 61ए 62 में किया है, उसकी शरण में तेरे को जाने को कहा है। (इति) यह (मे) मेरा (दृढ़म् इष्टः) पक्के तौर पर पूज्य देव है।

विशेष:- अन्य अनुवादकों ने अध्याय 18 के इस श्लोक 64 में ‘‘इष्टः’’ शब्द का अर्थ प्रिय किया है जो उचित नहीं है। गीता अध्याय 9 श्लोक 20 में ‘‘इष्टवा’’ शब्द का अर्थ ‘‘पूजा करके’’ किया तथा इसी अध्याय 18 के श्लोक 70 में ‘‘इष्टः’’ शब्द का अर्थ ‘‘पूजित’’ किया है। यदि श्लोक 64 में भी ‘‘पूजित’’ कर दिया जाता तो सब ठीक हो जाता। गीता अध्याय 18 के श्लोक 63 में स्पष्ट कर दिया कि गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मेरे द्वारा इस गीता शास्त्रा में तुझे कह दिया है। जैसे उचित लगे, कर। गीता अध्याय 8 श्लोक 5 तथा 7 में अपनी भक्ति करने से अपनी प्राप्ति कही है। श्लोक 8ए 9ए 10 में श्लोक 3 वाले परम अक्षर ब्रह्म की भक्ति कही है। उसकी भक्ति करने वाला उसको प्राप्त होगा। इस अध्याय 18 के श्लोक 64 में भी इसी को अपना इष्ट देव यानि पूजित देव बताया है।

 ‘‘तत्वदर्शी सन्त की पहचान’’:-- उपरोक्त गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में कहा है कि जो सन्त संसार रूपी वृक्ष के सर्व भागों को भिन्न.2 बताए, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला यानि तत्वदर्शी सन्त है। जो आप जी ने ऊपर पढ़ा कि संसार रूपी वृक्ष की जड़े (मूल)तो परम अक्षर ब्रह्म है, तना अक्षर पुरूष अर्थात् परब्रह्म है, डार क्षरपुरूष अर्थात् ब्रह्म (काल) है तथा तीनों शाखाऐं रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिवजी है तथा पत्ते रूपी प्राणी हैं।

दूसरी पहचान:-- गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में कहा है कि ब्रह्मलोक से लेकर सर्व लोक नाश्वान हैं। गीता अध्याय 8 श्लोक 17 में कहा है कि परब्रह्म का एक दिन एक हजार युग का होता है इतनी ही रात्रि होती है। जो इस अवधी को जानता है व काल को तत्व से जानने वाला है अर्थात् तत्वदर्शी सन्त है। कृप्या देखें गीता अध्याय 8 श्लोक 17 के अनुवाद में।

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11/28/2022
11/28/2022
11/16/2022

#गरिमा_गीता_की_Part_62
ब्रह्म (काल) के उपासक उसी का आहार।।

अध्याय 9 के श्लोक 12 में कहा है कि आसुरी स्वभाव (वृत्ति) वाले व्यर्थ कार्यों (ताश खेलना, शराब पीना, व्यर्थ की बातें करना, हुक्का पीना, मांस खाना, निन्दा करना, सिनेमा देखना, चोरी-जारी करना आदि) में तथा व्यर्थ आशाओं में व्यर्थ ज्ञान वाले मूर्ख राक्षसी स्वभाव वश रहते हैं।

अध्याय 9 के श्लोक 13 में वर्णन है कि जो भक्त आत्मा हैं वे मुझे प्राणियों का मालिक अविनाशी (जैसा अध्याय 15 के श्लोक 18 में कहा है कि मैं केवल मेरे इक्कीस ब्रह्माण्डों में जितने स्थूल शरीर के प्राणियों तथा जीवात्मा हैं, उनसे उत्तम हूँ। इसलिए लोक व वेदों में पुरुषोत्तम प्रसिद्ध हूँ परंतु वास्तव में पुरूषोत्तम व अविनाशी तो कोई और ही है। गीता जी के अध्याय 15 के श्लोक 17 में) जान कर अनन्य मन (आन उपासना त्याग कर शास्त्रानुकूल साधना और तीनों गुणों से ऊपर उठ कर केवल एक अक्षर ‘‘ऊँ‘‘ का जाप करते हुए) से मेरा भजन करते हैं। अध्याय 9 के श्लोक 14 में बताया है कि ऐसे सुचारू भक्त (दृढ़ नियमों वाले) निरन्तर मेरे गुणों व नाम का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हैं और मुझको प्रणाम करते हैं। सदा मेरे ध्यान में लगे हुए भिन्न.2 प्रकार से मेरी उपासना करते हैं। ये सब काल उपासक भी काल का आहार बनते हैं। प्रमाण गीता अध्याय 11 श्लोक 21 में स्पष्ट है कि जो महर्षिजन तथा देवताजन काल ब्रह्म की स्तुति कर रहे हैं, गुणगान कर रहे हैं, आप उनको भी खा रहे हो। वे आपके मुख में प्रवेश कर रहे हैं।

अध्याय 9 श्लोक 15-19 का सारांश:-
श्लोक 15:- अन्य साधक मुझे ज्ञान यज्ञ यानि वेदों के श्लोकों का प्रतिदिन पठन-पाठन करके मेरी पूजा करते हैं। जैसे यजुर्वेद के अध्याय 36 के मंत्र के आगे ओउम् अक्षर लगाकर गायत्री मंत्र नाम रखकर इसी एक वेद मंत्र का सैंकड़ों बार प्रतिदिन उच्चारण करने लगे। इस प्रकार वेद मंत्रों या गीता के श्लोकों या संतों की वाणी व सत्संग सुनने को ज्ञान यज्ञ कहा जाता है। इससे मोक्ष नहीं होगा। अन्य साधक बहुत प्रकार से मेरे (विश्वतः मुखम्) को विश्व का मुखिया रूप में मानकर मेरी उपासना करते हैं। (9:15)

श्लोक 16:- काल ब्रह्म जो गीता ज्ञान दाता है, यह इस ब्रह्माण्ड का स्वामी है। जितने जीवात्मा इसके जाल में फँसे हैं। उनका सर्वेस्वा यह बना है। इसके लोक में कर्म करके ही फल मिलता है। इसलिए कहा है कि मेरे यानि काल ब्रह्म से सुविधा लेने के लिए तथा स्वर्ग में जाने के लिए धार्मिक क्रियाऐं करनी पड़ती है। इसलिए कहा है कि क्रतु यानि धार्मिक कर्म में हूँ। यज्ञ स्वधा औषधि हवन करने की सामग्री, घी, अग्नि आदि-आदि में ही हूँ यानि सब मेरा है। मुझसे लाभ लेने के लिए सब करना पड़ेगा।

अध्याय 9 के श्लोक 17 में कहा है कि मैं सब जगत का धारण कत्र्ता, माता-पिता-दादा, वेदों में जानने योग्य पवित्र ऊँ (ओंकार) मन्त्रा, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद मैं ही हूँ अर्थात् ब्रह्म ज्ञान व उपासना ही तीनों वेदों में है। चैथा अथर्ववेद है जो सृष्टि रचना की जानकारी देता है।

अध्याय 9 के श्लोक 18 में कहा है कि मेरे इक्कीस ब्रह्मण्डों में मैं ही स्वामी, स्थिति धारण कत्र्ता, साक्षी निवास स्थान, शरण योग्य परोपकारी, उत्पत्ति व विनाश कत्र्ता वाले इस अविनाशी विधान का कारण भी मैं ही हूँ।

अध्याय 9 के श्लोक 19 में कहा है कि मैं ही गर्मी - वर्षा, आकर्षण व बरसात, मैं ही अमृत और मृत्यु सत-असत् हूँ।

भगवान काल ने कहा है कि जो भी उपासक वेदों के ज्ञान आधार से शास्त्र अनुकूल साधना करता है उनके लिए उपास्य मैं (काल) ही हूँ। परंतु अंत में सर्व को खाऊँगा। किसी को नहीं छोड़ूं। फिर कर्माधार पर स्वर्ग-नरक, काल द्वारा व्यवस्थित विधान अनुसार चारों मुक्ति फिर चैरासी लाख जूनियों में डालूँगा। प्रमाण के लिए देखें गीता जी के अध्याय 11 के श्लोक 21 में जिसमें अर्जुन आँखों देखा हाल कह रहा है। जब काल भगवान ने अपना वास्तविक विराट रूप दिखाया। उसमें अर्जुन देख रहा है तथा कह रहा है कि भगवन आप तो देवताओं के समूह (झुण्ड के झुण्ड) को भी खा रहे हो। कुछ भयभीत हो कर हाथ जोड़ कर आपके नाम व गुणों का कीर्तन कर रहे हैं। महर्षि व सिद्ध समुदाय कल्याण हो! (बख्शदो-2) कल्याण हो! कहकर वेदों के उत्तम-2 स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं, आप उन्हें भी खा रहे हैं। फिर गीता जी के अध्याय 11 के श्लोक 32 में काल कह रहा है कि मैं सबको खाने के लिए प्रकट हुआ हूँ तथा बढ़ा हुआ काल हूँ, किसी को नहीं छोड़ूँ।

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